वैदिक कालीन शिक्षा | Vaidik Kalin Shiksha

वैदिक काल का समय 2500 – 500 ईसा पूर्व के मध्य माना जाता है। वैदिक काल में शिक्षा का मुख्य विषय वेद होता था। वेद शब्द की उत्पत्ति विद् धातु से हुई है जिसका अर्थ होता है ‘ज्ञान प्राप्त करना’

वेद का मुख्य विषय यज्ञ होता था। यज्ञ का आयोजनकर्ता यजमान तथा उसकी पत्नी होती थी। यज्ञ में 4 – अन्य ब्राह्मण सम्मलित होते थे जिनके नाम नीचे दिए गए हैं –

  1. ईश्वर की स्तुति करने वाले को होत्र कहा जाता था जो ऋग्वेद का जानकार होता था।
  2. गायन के माध्यम से ईश्वर की स्तुति करने वाले को उद्गातृ कहा जाता था। जो सामवेद का जानकार होता था।
  3. यज्ञ में आहुति देने वाले को अध्वर्यु कहा जाता था। जो यजुर्वेद का जानकार होता था। इसे यज्ञ प्रधान स्थान प्राप्त होता था।
  4. होत्र, उद्गातृ तथा अध्वर्युपर नियंत्रित रखने वालों को ब्रह्मा कहा जाता था जिसे चारों वेदों की जानकारी होती थी।

वैदिक कालीन शिक्षा के उद्देश्य 

वैदिक कालीन शिक्षा के उद्देश्य निम्नलिखित थे –

  • वैदिक कालीन समाज मुख्य रूप से परा तथा अपरा विद्या के प्रभाव में बटा हुआ था।
  • परा विद्या के लिए अलौकिक विषयों का अध्ययन करना होता था। जिनकी सहायता से ज्ञान, कर्म तथा उपासना के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति होती थी।
  • अपरा विद्या के लिए लौकिक विषयों का अध्ययन किया जाता था जिसकी सहायता से सामाजिक व्यवस्था का संचालन किया जाता था।
  • नैतिक चरित्र का निर्माण करना।
  • पवित्रता तथा धार्मिकता का विकास।
  • व्यक्तित्व का विकास।
  • संस्कृति का संरक्षण तथा प्रसार करना।

उपनयन संस्कार 

  • उपनयन का अर्थ होता है ‘समीप या ‘पास ले जाना’
  • गुरुकुल में प्रवेश के समय यज्ञोपवीत संस्कार होता था। यहीं से औपचारिक शिक्षा आरम्भ होती है।
  • उपनयन संस्कार के लिए ब्राह्मण बालक को 3 वर्ष, क्षत्रिय बालक को 11 वर्ष तथा वैश्य को 12 वर्ष की न्यूनतम आयु प्राप्त करना आवश्यक होता था।
  • शूद्र बालक हेतु उपनयन संस्कार का प्रावधान नहीं किया गया था।
  • उपनयन संस्कार के समय ब्राह्मण बालक को गायत्री मंत्र, क्षत्रिय बालक को त्रिष्टुप मंत्र, वैश्य बालक को जगती मंत्र का उच्चारण कराया जाता था।
  • गुरुकुल में रहने वाले बालक को अन्तेवासी या कुलवासी कहा जाता था।

वैदिक कालीन शिक्षा तथा छात्र 

  • वैदिक काल में छात्र एक अनुशासित जीवन निर्वाह करते थे।
  • एक वेद का अध्ययन करने वाले छात्रों को स्नातक कहते हैं।
  • दो वेद का अध्ययन करने वाले छात्रों को वसु कहते हैं।
  • तीन वेद का अध्ययन करने वाले छात्रों को रूद्र कहते हैं।
  • चार वेद का अध्ययन करने वाले छात्रों को आदित्य कहते हैं।
  • वैदिक काल में ब्राह्मण शरीर के ऊपरी भाग के लिए काले नर हिरन की खाल, क्षत्रिय धब्बेदार हिरन की खाल, वैश्य बकरे की खाल का उपयोग करते थे।
  • शरीर के निचले भाग के लिए ब्राह्मण सन से बने पटसन, क्षत्रिय रेशम से बने, वैश्य ऊन से बने परिधान का प्रयोग करते थे।
  • ब्राह्मण सूत से बने यज्ञोपवीत (जनेयु), क्षत्रिय सन से बने तथा वैश्य ऊन से बने हुए तीन लड़ी वाले यज्ञोपवीत का प्रयोग करते थे।
  • वैदिक काल में छात्रों की दिनचर्या कठोर नियमों से बनी होती है।
  • ब्रह्म मूहूर्त में सोकर जगना नित्य क्रिया से निवृत्त होना।
  • विद्या अध्ययन करना, होमाग्नि के लिए लकड़ी इकट्ठा करना, गुरुकुल के गाय तथा अन्य पशुओं को जंगल ले जाना, भिक्षादन करना आदि।
  • वैदिक काल में शिक्षा प्रणाली व्यक्तिगत भिन्नता के सिद्धांत पर आधारित थी।
  • शिक्षण हेतु प्रश्नोत्तर, कथा, व्याख्यान, वाद – विवाद आदि विधियों का प्रयोग किया जाता था।
  • वैदिक काल में ज्ञान प्राप्त करने की दो विधियाँ प्रचलित थीं – तप (लौकिक) और श्रुति (अलौकिक)
  • तप में बालक स्वयं चिंतन, मनन तथा अनुभूति करके ज्ञान प्राप्त करता था।
  • श्रुति में बालक दूसरों से सुनकर ज्ञान प्राप्त करता था।
  • वैदिक काल में कोई निर्धारित परीक्षा प्रणाली नहीं थी।
  • वैदिक काल में गुरु तथा शिष्य के मध्य मधुर तथा आध्यात्मिक सम्बन्ध थे।
  • वैदिक काल में नारी शिक्षा को पर्याप्त महत्त्व दिया गया था।
  • वेद में स्त्री जाति को पुरुष का पूरक माना जाता था।

समावर्तन संस्कार 

  • समावर्तन शब्द का अर्थ है ‘वेद अध्ययन के बाद घर की ओर पुनः प्रस्थान करना’।
  • समावर्तन संस्कार 15 वर्ष की आयु में किया जाता था।
  • गुरु की अनुमति से ब्रह्मचारी समावर्तन संस्कार कराता था तथा गुरु को गुरुदक्षिणा भेट करता था।
  • गुरु के द्वारा ब्रह्मचारी को भविष्य की योजना के अनुरूप दिशा निर्देश प्रदान किये जाते थे।
  • शिक्षा का माध्यम संस्कृत था।
  • वैदिक काल में दंड का कोई प्रावधान नहीं था।
  • शारीरिक दंड पूर्णतः निषिद्ध था।
  • छात्रों से गलती होने पर आत्मसिद्धि के लिए उद्दालक व्रत का पालन कराया जाता था।
  • उद्दालक व्रत में छात्र को 3 से 4 माह में अत्यन्त अल्प आहार में रहना पड़ता था।
  • उद्दालक व्रत में 2 माह तक जौ का माड़, एक माह दूध, आधे माह तक छेन्ना, आठ दिन तक व्रत, 6 दिन तक बिन मांगी भिक्षा, तीन दिन तक केवल पानी तथा 1 दिन तक निराहार रहना पड़ता था।
  • वैदिक काल में वित्त व्यवस्था गुरु के निजी उपार्जित धर्म शिष्यों द्वारा लायी गई भिक्षा, गुरुदक्षिणा दान में मिले पशु व भूमि से प्राप्त आय, उपहार तथा राजकीय शिक्षा की सहायता से संचालित होती थी।

वैदिक कालीन शिक्षा के गुण 

  • आदर्श वादिता
  • स्वाअनुशासन
  • गुरु – शिष्य सम्बन्ध
  • शिक्षा के लिए शांत वातावरण
  • शिक्षा व्यवस्था
  • शिक्षण विधियाँ

वैदिक कालीन शिक्षा के दोष 

  • धर्म को अधिक महत्त्व देना।
  • स्त्री शिक्षा की उपेक्षा।
  • आम जनमानस की भाषा की उपेक्षा।
  • शूद्र वर्ग के शिक्षा पर अप्रत्यक्ष प्रतिबन्ध।

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