देवनागरी लिपि | Devanagari Lipi

देवनागरी लिपि को समझने से पहले यहाँ समझने वाली बात यह है कि लिपि किसे कहते हैं ? 

मौखिक भाषा को लिखित रूप में व्यक्त करने हेतु जिन चिन्हों का प्रयोग किया जाता है, उन्हें लिपि कहते हैं।

लिपि की मुख्य अवस्थाएं 

लिपि की चार अवस्थाएं हैं जिनके नाम नीचे दिए गए हैं –

  1. प्रतीक लिपि
  2. चित्र लिपि
  3. भाव लिपि
  4. ध्वनि लिपि

देवनागरी लिपि का उद्भव 

हमारे देश की प्रमुख भाषा हिन्दी है और हिन्दी भाषा की लिपि देवनागरी है। देवनागरी लिपि का जन्म ब्राह्मी लिपि से हुआ है ब्राह्मी लिपि संसार की सबसे प्राचीन ध्वनि लिपि  मानी जाती है।

माना जाता है की ब्राह्मी लिपि का अविष्कार आर्यों ने किया। वैदिक संस्कृति और संस्कृत में इस लिपि का उपयोग किया गया।

ब्राह्मी लिपि का सर्वाधिक विस्तार महात्मा बुद्ध के समय में हुआ था इसके बाद राजा अशोक के समय ब्राह्मी लिपि ही प्रचलित थी। राजा अशोक के द्वारा निर्मित शिला लेखों के संदेशों को लिखने में भी ब्राह्मी लिपि का प्रयोग किया गया है।

देवनागरी लिपि की विशेषताएँ 

देवनागरी लिपि की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • देवनागरी लिपि के वर्णों का बनावट सरल और सुन्दर है।
  • देवनागरी लिपि में जो बोला जाता है वही लिखा जाता है।
  • देवनागरी लिपि को आसानी से सीखा जा सकता है।
  • हिन्दी, संस्कृत, मराठी और नेपाली भाषाएँ इसी लिपि में लिखी गई हैं।
  • जो ध्वनि का नाम वही वर्ण का नाम।
  • मूक वर्ण नहीं।
  • एक वर्ण से दूसरे वर्ण का भ्रम नहीं।
  • भारतीय संविधान में अनुच्छेद 343 (1) में स्पष्ट घोषणा की गई है कि “संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी।”

देवनागरी लिपि के दोष

  • अनुस्वार एवं अनुनासिकता के प्रयोग में एकरूपता का अभाव होना।
  • लिखते समय हाथ को बार – बार उठाना पड़ता है।
  • वर्णों के संयुक्तीकरण में ‘र’ के प्रयोग को लेकर भ्रम की स्थिति।
  • शिरोरेखा का उपयोग अनावश्यक अलंकरण के लिए।
  • वर्णों के संयुक्त करने की कोई निश्चित व्यवस्था नहीं।

हिन्दी व्याकरण …

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