विकलांग बालकों का अर्थ, परिभाषा, प्रकार एवं शिक्षा

विकलांग बालक किसे कहते हैं ?

इन बालकों में स्थाई रूप से कोई न कोई शारीरिक दोष होता है। अर्थात कुछ बालकों में जन्म से शरीर के किसी अंग में दोष होता है या बाद में किसी दुर्घटना, बिमारी या चोट लगने लगने के कारण से उनके शरीर का कोई अंग दोष – युक्त हो जाता है, उन्हें विकलांग बालक कहते हैं।

क्रो एण्ड क्रो के अनुसार, “एक व्यक्ति जिसमे कोई इस प्रकार का शारीरिक दोष होता है जो किसी भी रूप में उसे सामान्य क्रियाओं में भाग लेने से रोकता है या उसे सीमित रखता है, उसको हम विकलांग व्यक्ति कह सकते हैं।”

विकलांग बालकों के प्रकार 

विकलांग बालकों को निम्नलिखित प्रकार से विभक्त किया गया है –

  • अपंग बालक
  • अंधे और अर्द्ध अंधे बालक
  • बहिरे और अर्द्ध बहिरे बालक
  • दोषयुक्त वाणी वाले बालक
  • अत्याधिक कोमल या निर्बल बालक

अपंग बालक किसे कहते हैं ?

अपंग बालक वे होते हैं जो जन्मजात, बीमारी या किसी दुर्घटना के कारण से अपंग हो जाते हैं। इसके अन्तर्गत अंधे, बहिरे, गूंगे, लंगड़े आदि कई प्रकार के बालक आते हैं।

अंधे और अर्द्ध अंधे बालक किसे कहते हैं ?

अंधे और अर्द्ध अंधे बालक वे होते हैं जिनमे दृष्टिदोष होता है। बालक में यह दोष जन्म से या किसी बीमारी या दुर्घटना के कारण से आ जाता है।

बहिरे और अर्द्ध बहिरे बालक किसे कहते हैं ?

बहिरा बालक वह होता है जिसने कभी कोई आवाज न सुनी हो। बहिरे लोग जन्म से प्रायः गूंगे होते है। तथा जिन लोगों की सुनने की शक्ति कमजोर हो जाती है, वे अर्द्ध बहिरे कहलाते हैं।

दोषयुक्त वाणी वाले बालक  किसे कहते हैं ?

दोषयुक्त वाणी का कारण शारीरिक दोष हो सकता है। कभी – कभी इस प्रकार के दोष का कारण मनोवैज्ञानिक या संवेगात्मक अस्थिरता भी होता है। दोषयुक्त वाणी के अन्तर्गत तुतलाना, हकलाना, नाक दबाकर बोलना, मोटी आवाज आदि आते हैं।

अत्याधिक कोमल या निर्बल बालक किसे कहते हैं ?

कोमल बालक वे बालक होते हैं जो अपने शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति ज्यादा सचेत रहते हैं।

जिनमे शक्ति की कमी, पाचन क्रिया में गड़बड़ी, रक्त की कमी, ग्रन्थि आदि होते हैं वे बालक इसी वर्ग में आते हैं।

विकलांग बालको की शिक्षा व्यवस्था

  • विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप विद्ध्यालय खोले जाने चाहिए।
  • चिकित्सक के सलाह से आवश्यक संस्थान उपलब्ध कराना चाहिए।
  • विद्ध्यालय में डॉक्टरों एवं विशेषज्ञों की राय लेकर उनके लिए संभव चिकित्सा में यंत्रों एवं साधनों का प्रयोग करना चाहिए।
  • अपंग बालकों के बैठने के लिए उचित व्यवस्था।
  • अंधे बालकों के लिए ब्रेल लिपि (प्रवर्तक – लुइस ब्रेल) का प्रयोग करके शिक्षा देना चाहिए।
  • अर्द्ध बहिरे बालक को कक्षा में आगे बैठकर शिक्षा देना चाहिए। यदि हो सके तो ऐसे बालकों के लिए कर्ण – यन्त्र का प्रयोग कराया जाए।
  • माता – पिता तथा गुरुजनों को प्रेम एवं सहानुभूति पूर्वक व्यवहार करना चाहिए।
  • बालक की शक्ति के अनुकूल पाठ्यक्रम तथा खेलकूद की व्यवस्था होनी चाहिए।
  • शिक्षण में खेल – विधि तथा श्रव्य – दृश्य विधियों का प्रयोग किया जाना चाहिए।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के अन्तर्गत दिव्यांग बालकों के लिए प्रावधान 

  • दिव्यांग बालकों के लिए एकीकृत शिक्षा।
  • व्यवसायिक प्रशिक्षक।
  • जन संचार साधनों का प्रयोग।
  • विकलांगो के लिए जनपद केन्द्रों पर छात्रावास सहित विद्ध्यालय खोले जाए।
  • विशिष्ट संसाधन तथा उपकरण उपलब्ध कराये जाए। आदि।

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